Lyrics
[TITLE]
25 अगस्त 2017 — एक आवाज़ जो आज तक ज़िंदा है
[INTRO]
पच्चीस अगस्त दो हज़ार सत्रह,
रखाइन की धरती रोई थी,
एक तारीख़ आई थी ऐसी,
जिसने लाखों की दुनिया खोई थी।
धुआँ उठा था गाँवों से,
डर उतर आया आँखों में,
माँ ने बच्चे को थामा,
और लोग निकल पड़े रास्तों में।
[VERSE 1]
सालों से पहचान का दर्द,
नागरिकता का सवाल,
भेदभाव और बंदिशों के बीच
मुश्किल था हर एक साल।
फिर पच्चीस अगस्त की रात,
ARSA के हमलों के बाद,
Myanmar की सेना ने शुरू किया
एक बड़ा सैन्य अभियान।
हत्या के आरोप सामने आए,
यौन हिंसा की बातें आईं,
गाँव जलाने और घर उजाड़ने की
रिपोर्टें दुनिया तक आईं।
[CHORUS]
याद रखो पच्चीस अगस्त,
याद रखो वो रात,
जो अपने घर से दूर हुए
सुनो उनकी आज आवाज़।
नफ़रत नहीं, इंसाफ़ चाहिए,
बदला नहीं, अधिकार चाहिए,
जिस बच्चे ने अपना घर खोया,
उसको सुरक्षित संसार चाहिए।
[VERSE 2]
सात लाख पचास हज़ार से ज्यादा
लोग सीमा पार चले गए,
Cox’s Bazar के शिविरों में
नए जीवन को ढूँढने लगे।
किसी के पास सामान नहीं,
किसी के पास अपना घर नहीं,
पीछे रह गई जन्मभूमि,
आगे कोई मंज़िल नहीं।
नावों में, पैदल रास्तों में,
आँखों में डर और दर्द,
एक ही सवाल था दिल में—
क्या फिर मिलेगा अपना घर?
[VERSE 3]
दो हज़ार उन्नीस में
The Gambia अदालत तक गया,
Myanmar पर Genocide Convention
के उल्लंघन का आरोप लगाया।
दो हज़ार बीस में ICJ ने
अस्थायी सुरक्षा के आदेश दिए,
रोहिंग्या लोगों के अधिकारों की
रक्षा के निर्देश दिए।
दो हज़ार बाईस में अदालत ने कहा,
मामला सुनने का अधिकार है,
कानून की लंबी राह में
न्याय की अभी तलाश है।
कई देशों ने बाद में
मामले में हस्तक्षेप किया,
दुनिया ने फिर सवाल किया—
क्या इंसाफ़ ने रास्ता लिया?
[CHORUS]
याद रखो पच्चीस अगस्त,
याद रखो वो रात,
जो अपने घर से दूर हुए
सुनो उनकी आज आवाज़।
नफ़रत नहीं, इंसाफ़ चाहिए,
बदला नहीं, अधिकार चाहिए,
हर बच्चे को सुरक्षित बचपन,
हर परिवार को अपना घर चाहिए।
[VERSE 4]
दो हज़ार इक्कीस आया,
Myanmar में तख्तापलट हुआ,
देश के अंदर संघर्ष बढ़ा,
और दर्द फिर गहरा हुआ।
Rakhine में भी हालात बदले,
लड़ाई फिर तेज़ हुई,
दो हज़ार चौबीस के बाद
नई विस्थापन की लहर उठी।
कुछ लोग फिर घर से निकले,
कुछ रास्तों में फँस गए,
कुछ Bangladesh पहुँचे,
कुछ Rakhine में रह गए।
[BRIDGE]
आठ साल बीत गए,
पर कहानी खत्म नहीं हुई,
शिविर में जन्मे बच्चे ने
अपनी जन्मभूमि देखी नहीं।
उसके लिए घर एक सपना,
एक तस्वीर, एक कहानी,
माँ की आँखों में बची हुई
पुरानी मिट्टी की निशानी।
[VERSE 5 — TODAY]
आज दो हज़ार छब्बीस है,
फिर भी सवाल वही खड़ा,
लाखों लोग विस्थापित हैं,
संकट अभी तक नहीं मिटा।
Bangladesh में शरणार्थी,
Myanmar में जारी संघर्ष,
हर तरफ़ इंतज़ार है,
हर दिल में वापसी का हर्ष।
लेकिन वापसी तभी होगी
जब सुरक्षा और अधिकार हों,
जब सम्मान के साथ जीवन हो,
जब डर के सारे द्वार बंद हों।
[FINAL CHORUS]
पच्चीस अगस्त...
पच्चीस अगस्त...
ये सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं,
ये इंसानों की पुकार है,
जिन्होंने अपना घर खोया,
उनकी कहानी आज भी जारी है।
नफ़रत नहीं, इंसाफ़ चाहिए,
बदला नहीं, अधिकार चाहिए,
हर इंसान को जीने का हक़,
हर बच्चे को अपना संसार चाहिए।
[OUTRO]
पच्चीस अगस्त दो हज़ार सत्रह से,
आज दो हज़ार छब्बीस तक,
साल बदलते गए,
लेकिन यादें नहीं बदलीं।
इतिहास को मत मिटाओ,
पीड़ितों को मत भूलो,
सच को दुनिया तक पहुँचाओ,
और इंसानियत को मत भूलो।
एक दिन वो सुबह आए,
जब कोई बच्चा डरकर न पूछे—
“मेरा घर कहाँ है?”
बल्कि मुस्कुराकर कहे—
“यही मेरा घर है।”
पच्चीस अगस्त...
याद रखो।
याद रखो।
याद रखो।
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